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शनिवार, 12 दिसंबर 2015
अभिव्यक्ति :- "खूबसूरती"
बर्तमान दौर में पत्रकारिता में चाटुकारिता ने अपना पैर जमा लिया है। जिसका खामियाजा विशुद्ध रूप से पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक सरोकार से जुडी खबरों को उकेरने वाले कलमकारों को भुगतना पड़ रहा है।
ऐसे समय में विकल्प की तलास शुरू होती है ताकि सामाजिक सरोकार को स्थान मिले और समाज के लोगों का कल्याण हो सके। उनकी बातें भी सही माध्यम से उन तक पहुंच सके जंहा से उन्हें न्याय की आस है।
उसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु इस ब्लॉग का सृजन किया गया है ताकि आम जन मानस हतास व निराश न हों। उनकी बातें इसके माध्यम से सदन पटल पर लायी जायेगी और उन्हें उनका वाजिब हक और लाभ मिल सके इस दिशा में प्रयास किया जायेग।
मै राजेश झारखण्ड प्रदेश के गिरिडीह जिला का निवासी हूँ। मै वर्ष 1982 से रंगकर्म और वर्ष 1991 से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ा हूँ।
मैने पत्रकारिता के साथ रंगकर्म को भी भरपूर योगदान दिया। मेरे द्वारा लिखित व निर्देशित कई नाटक विभिन्न नाट्य प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत हुई है। विभिन्न नाट्य प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट अभिनय के लिए मै पुरस्कृत भी हुआ हूँ। फिलवक्त मै फ़िल्म के क्षेत्र से भी जुड़ा हूँ। मेरी पहली भोजपुरी फ़िल्म "प्लेटफार्म नम्बर-2" बीते 1जून 2018 को प्रदर्शित हुई है। जिसमे मैने मुख्य खलनायक की भूमिका अदा किया है।
सम्पर्क सूत्र: patrakarrajesh@gmail.com व्हाट्सऐप- 9431366404
कहानी : " किस्मत"
कहानी :-
" किस्मत"
एक सेठ जी थे -
जिनके पास काफी दौलत थी.
सेठ जी ने अपनी बेटी की शादी एक बड़े घर में
की थी.
परन्तु बेटी के भाग्य में सुख न होने के कारण
उसका पति जुआरी, शराबी निकल गया.
जिससे सब धन समाप्त हो गया.
बेटी की यह हालत देखकर सेठानी जी रोज सेठ
जी से कहती कि आप दुनिया की मदद करते
हो,
मगर अपनी बेटी परेशानी में होते हुए उसकी
मदद क्यों नहीं करते हो?
सेठ जी कहते कि
"जब उनका भाग्य उदय होगा तो अपने आप सब
मदद करने को तैयार हो जायेंगे..."
एक दिन सेठ जी घर से बाहर गये थे कि, तभी
उनका दामाद घर आ गया.
सास ने दामाद का आदर-सत्कार किया और
बेटी की मदद करने का विचार उसके मन में आया
कि क्यों न मोतीचूर के लड्डूओं में अर्शफिया रख
दी जाये...
यह सोचकर सास ने लड्डूओ के बीच में अर्शफिया
दबा कर रख दी और दामाद को टीका लगा
कर विदा करते समय पांच किलों शुद्ध देशी
घी के लड्डू, जिनमे अर्शफिया थी, दिये...
दामाद लड्डू लेकर घर से चला,
दामाद ने सोचा कि इतना वजन कौन लेकर
जाये क्यों न यहीं मिठाई की दुकान पर बेच
दिये जायें और दामाद ने वह लड्डुयों का पैकेट
मिठाई वाले को बेच दिया और पैसे जेब में
डालकर चला गया.
उधर सेठ जी बाहर से आये तो उन्होंने सोचा घर
के लिये मिठाई की दुकान से मोतीचूर के लड्डू
लेता चलू और सेठ जी ने दुकानदार से लड्डू
मांगे...मिठाई वाले ने वही लड्डू का पैकेट सेठ
जी को वापिस बेच दिया.
सेठ जी लड्डू लेकर घर आये.. सेठानी ने जब लड्डूओ
का वही पैकेट देखा तो सेठानी ने लड्डू
फोडकर देखे, अर्शफिया देख कर अपना माथा
पीट लिया.
सेठानी ने सेठ जी को दामाद के आने से लेकर
जाने तक और लड्डुओं में अर्शफिया छिपाने की
बात कह डाली...
सेठ जी बोले कि भाग्यवान मैंनें पहले ही
समझाया था कि अभी उनका भाग्य नहीं
जागा...
देखा मोहरें ना तो दामाद के भाग्य में थी
और न ही मिठाई वाले के भाग्य में...
इसलिये कहते हैं कि भाग्य से
ज्यादा
और...
समय
से पहले न किसी को कुछ मिला है और न
मीलेगा!ईसी लिये ईशवर जितना दे उसी मै
संतोष करो...
झूला जितना पीछे जाता है, उतना ही आगे
आता है।एकदम बराबर।
सुख और दुख दोनों ही जीवन में बराबर आते हैं।
" किस्मत"
एक सेठ जी थे -
जिनके पास काफी दौलत थी.
सेठ जी ने अपनी बेटी की शादी एक बड़े घर में
की थी.
परन्तु बेटी के भाग्य में सुख न होने के कारण
उसका पति जुआरी, शराबी निकल गया.
जिससे सब धन समाप्त हो गया.
बेटी की यह हालत देखकर सेठानी जी रोज सेठ
जी से कहती कि आप दुनिया की मदद करते
हो,
मगर अपनी बेटी परेशानी में होते हुए उसकी
मदद क्यों नहीं करते हो?
सेठ जी कहते कि
"जब उनका भाग्य उदय होगा तो अपने आप सब
मदद करने को तैयार हो जायेंगे..."
एक दिन सेठ जी घर से बाहर गये थे कि, तभी
उनका दामाद घर आ गया.
सास ने दामाद का आदर-सत्कार किया और
बेटी की मदद करने का विचार उसके मन में आया
कि क्यों न मोतीचूर के लड्डूओं में अर्शफिया रख
दी जाये...
यह सोचकर सास ने लड्डूओ के बीच में अर्शफिया
दबा कर रख दी और दामाद को टीका लगा
कर विदा करते समय पांच किलों शुद्ध देशी
घी के लड्डू, जिनमे अर्शफिया थी, दिये...
दामाद लड्डू लेकर घर से चला,
दामाद ने सोचा कि इतना वजन कौन लेकर
जाये क्यों न यहीं मिठाई की दुकान पर बेच
दिये जायें और दामाद ने वह लड्डुयों का पैकेट
मिठाई वाले को बेच दिया और पैसे जेब में
डालकर चला गया.
उधर सेठ जी बाहर से आये तो उन्होंने सोचा घर
के लिये मिठाई की दुकान से मोतीचूर के लड्डू
लेता चलू और सेठ जी ने दुकानदार से लड्डू
मांगे...मिठाई वाले ने वही लड्डू का पैकेट सेठ
जी को वापिस बेच दिया.
सेठ जी लड्डू लेकर घर आये.. सेठानी ने जब लड्डूओ
का वही पैकेट देखा तो सेठानी ने लड्डू
फोडकर देखे, अर्शफिया देख कर अपना माथा
पीट लिया.
सेठानी ने सेठ जी को दामाद के आने से लेकर
जाने तक और लड्डुओं में अर्शफिया छिपाने की
बात कह डाली...
सेठ जी बोले कि भाग्यवान मैंनें पहले ही
समझाया था कि अभी उनका भाग्य नहीं
जागा...
देखा मोहरें ना तो दामाद के भाग्य में थी
और न ही मिठाई वाले के भाग्य में...
इसलिये कहते हैं कि भाग्य से
ज्यादा
और...
समय
से पहले न किसी को कुछ मिला है और न
मीलेगा!ईसी लिये ईशवर जितना दे उसी मै
संतोष करो...
झूला जितना पीछे जाता है, उतना ही आगे
आता है।एकदम बराबर।
सुख और दुख दोनों ही जीवन में बराबर आते हैं।
बर्तमान दौर में पत्रकारिता में चाटुकारिता ने अपना पैर जमा लिया है। जिसका खामियाजा विशुद्ध रूप से पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक सरोकार से जुडी खबरों को उकेरने वाले कलमकारों को भुगतना पड़ रहा है।
ऐसे समय में विकल्प की तलास शुरू होती है ताकि सामाजिक सरोकार को स्थान मिले और समाज के लोगों का कल्याण हो सके। उनकी बातें भी सही माध्यम से उन तक पहुंच सके जंहा से उन्हें न्याय की आस है।
उसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु इस ब्लॉग का सृजन किया गया है ताकि आम जन मानस हतास व निराश न हों। उनकी बातें इसके माध्यम से सदन पटल पर लायी जायेगी और उन्हें उनका वाजिब हक और लाभ मिल सके इस दिशा में प्रयास किया जायेग।
मै राजेश झारखण्ड प्रदेश के गिरिडीह जिला का निवासी हूँ। मै वर्ष 1982 से रंगकर्म और वर्ष 1991 से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ा हूँ।
मैने पत्रकारिता के साथ रंगकर्म को भी भरपूर योगदान दिया। मेरे द्वारा लिखित व निर्देशित कई नाटक विभिन्न नाट्य प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत हुई है। विभिन्न नाट्य प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट अभिनय के लिए मै पुरस्कृत भी हुआ हूँ। फिलवक्त मै फ़िल्म के क्षेत्र से भी जुड़ा हूँ। मेरी पहली भोजपुरी फ़िल्म "प्लेटफार्म नम्बर-2" बीते 1जून 2018 को प्रदर्शित हुई है। जिसमे मैने मुख्य खलनायक की भूमिका अदा किया है।
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